कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा

2 जून 2010

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि, हर ख्वाहिश पर दम निकले

नाम                                  : एक दोस्त
पेशा                                  : रिपोर्टर
आमदनी का दूसरा जरिया    : किसी कंपनी का सामान लोगों को बेचना.
नाम                                 : दूसरा दोस्त
पेशा                                 : प्रिंटिंग प्रेस 
आमदनी का दूसरा जरिया   : किसी कंपनी का सामान लोगों को बेचना.  
नाम                             : एक अजनबी, एक गृहणी, एक सफल व्यवसायी,
                                       एक सरकारी कर्मचारी, एक विद्यार्थी ,
पेशा                             : अलग-अलग
आमदनी का दूसरा जरिया: किसी कंपनी का सामान लोगों को बेचना.
     ज़ाहिर है कि ऊपर लिखे सभी लोगों में सिर्फ एक समानता है कि वे ऐसी कम्पनी से जुड़े हुए हैं जिसका सामान बेचकर अपनी आमदनी में इजाफा करते हैं या फिर वर्तमान आमदनी इनके अनुकूल नहीं है. आमदनी के दूसरे ज़रिये को हेय दृष्टी से नहीं देखा जाना चाहिए मगर अपनेआप पर, अपने पेशे या अपने शौक को दरकिनार कर बाज़ार के हाथों कि कठपुतली बनते देख बुरा लगता है. बाज़ार की शक्ति असीम है, अभी कल ही उपरोक्त वर्णित दोस्त के बुलावे पर एक मीटिंग में गया था . काफी लोग थे वहां, मै भी पीछे जाकर खड़ा हो गया, एक लीडर इस घोर गर्मी में भी कोट-पैंट पहने जोर-जोर से (प्रभावशाली आवाज़ में) लोगों को करोडपति बनने के नुस्खे बता रहा था. कुछ लोगों को उसकी बातें समझ में नहीं आ रही थीं, कुछ लोग गर्मी से परेशान थे. कुछ लोग उसकी बातों को सुनकर उत्साहित ढंग से तालियाँ बजा रहे थे. लीडर बता रहा था कि, धन, समय, सुरक्षा को किस तरह से उसकी बताई कंपनी का सदस्य बनकर, काबू में किया जा सकता है. बन्दे ने एक चूहे-बिल्ली की कहानी सुनाई जिसमे चूहे और बिल्ली से पूछा गया कि भई क्या वजह है कि बिल्ली हमेशा पीछे रह जाती है चूहा बिल में चला ही जाता है? तो ज़वाब था  "Y फैक्टर" के कारण जो कि सबमे अलग-अलग पाया जाता है, बिल्ली का  "स्वादिष्ट मांस खाने का Y फैक्टर" कार्य करता है, ज़बकि चूहे का "अपना जीवन बचाने वाला Y फैक्टर". अब ज़रा गौर फरमाइए कि, क्या यहाँ बिल्ली का  "स्वादिष्ट मांस खाने का Y फैक्टर" जायज़ है? यहाँ लीडर ने चालाकी से कहानी में फेरबदल करके तालियाँ पिटवाली. "Y फैक्टर" पश्चिमी देशों का दर्शन है जिसमे स्थिरता को खतरा माना जाता है और इसे दूर करने में "Y फैक्टर" का अहम् योगदान होता है. जबकि हमलोगों ने हाल-फ़िलहाल ही  विकासशील देशों को छोड़कर पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी के दौर में उनकी अर्थ व्यवस्था को तितिर-बितिर होते देखा है. बहरहाल, बात हो रही थी "Y फैक्टर" की, पूरी दुनिया की आबादी को विभिन्न धार्मिक विश्वासों के आधार पर बांटा जा सकता है मगर आश्चर्यजनक बात यह है कि, हमारे मतभेदों के बावजूद हमारा एक ही लक्ष्य है-ख़ुशी प्राप्त करना जो हमें विभिन्न कार्यों और कारणों से प्राप्त होती है, इसे सरल गणितीय सूत्र में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-
                             मानव होने के नाते +"Y फैक्टर"  = खुशियाँ         यहाँ Y किसी व्यक्ति के जीवन में खुश हो लेने का  प्रतिनिधित्व करता है.  उपरोक्त समीकरण के अनुसार, "Y फैक्टर" केवल चर कारक है. क्योंकि हम सभी इंसान हैं, और सामान्य रूप में खुश होना चाहते हैं. मगर अफ़सोस कि ख़ुशी की यह परिभाषा जीवन के विभिन्न चरणों में एक जैसी नहीं रहती, इसके कारक ही बदल जाते हैं. अब जैसे बिल्ली का स्वादिष्ट मांस खाने का फैक्टर और चूहे का जीवन बचाने वाला फैक्टर मेरी समझ से एक ही है और वह है 'जीवन ' जिसके लिए हमसभी ,आपाधापी कर रहे हैं, सामान बेच रहे हैं, झूठ बोल रहे हैं. इस जीवन में किसी की  ख्वाहिशें बिल्ली है तो किसी की ख्वाहिशें चूहा. ..और इस दौर में बाज़ार ही है जिसने  इस चूहे-बिल्ली के खेल को शुरू किया है. एक कविता की बानगी लें :
आदमी आया
सपने  आये 
बाज़ार आया
सपने लाया
सपने आपस में झगडकर
लगे बिखरने,
बाज़ार के ३६ इंची टीवी वाले सपने के आगे  
बच्चे की साइकल वाला सपना
हल्का  पड़ने लगा,
बचाने के लिए अपने सपनों को 
बाज़ार वाले सपने खरीदते-खरीदते आदमी
अपने सपनों को बेचने लगा
इस उम्मीद में कि, 
बचे रहें सपने किसी न किसी की आँखों में
पर हत्तेरे की बाज़ार की!
आदमी की आँखों पर ही काबिज़ हो बैठा.
अब आदमी/दोस्त/रिश्तेदार   हर दूसरे आदमी/दोस्त/रिश्तेदार  का क्लाईंट
हो बैठा.
बाज़ार मस्त है, आदमी त्रस्त है !

13 मई 2010

एक पाती:पिता की


 मेरे बच्चे! मैं हूँ तुम्हारा पिता. पिता होना सबके बस कि बात नहीं. अभी मैं जो कुछ भी लिखूंगा उसे तुम पिता बनकर ही समझ पाओगे. पिता विशाल पेड़ सदृश्य होते हैं. बच्चे उसकी छाया में निश्चिन्त होकर फलते-फूलतें हैं. हालाकि बच्चे तो स्वाभाविक तौर  पर अपनी माता के दुलारे होते हैं, और मां के आँचल से निकले तो दादा-दादी और बुआ के स्नेह में पगते रहते हैं. मगर इन सारे रिश्तों में पिता को गंभीर मानकर छोड़ दिया जाता है (Father Hardstone), लगता है पिता का दिल धड़कता ही नहीं? कुछ पिता अपनी डिग्निटी को मेंटेन करने में ही तस्वीर बनके अपने बच्चों के सामने लटक जाते हैं. आम तौर पर पिता की तमाम उम्र  परिवार को चलाने की जोड़-तोड़ में जाया हो जाती है, पिता को अपने सारे बच्चों पर एक समान ध्यान रहता है. ऐसे में कोई शिकायत करे तो भला पिता क्या करे? अब मुझे लो, बिजनेस में उतार के कारण तानावग्रसित हूँ मगर मै तुमसे बाँट नहीं सकता क्योंकि तुम बहुत छोटे हो, और जब तुम बड़े हो जाओगे, तब मैं अपने 'पितास' (एक तरह का स्वाभिमान) को मेंटेन करने में लग जाऊंगा, तुम इज्ज़त करने में.
बेटा! क्या तुममें और मुझमे 'दोस्ती' का रिश्ता नहीं पनप सकता? तुम सोचोगे कि, मुझमे और दादाजी में यह रिश्ता नहीं पनपा  तो आगे कैसे...? बेटे! तुम्हारे दादाजी का वक़्त दूसरा था, और मुझे उनसे कोई शिकायत भी नहीं. जबकि मेरी पीढ़ी ने संतुलन बनाना सीख लिया है. 
              खैर, मेरे बच्चे! ईश्वर करे की कभी तुम्हें अपनी भावनाओं को बाँटने के लिए अपने पिता की जरुरत हो और मैं जरुर से जरुर तुम्हारे पास मौजूद रहूँ .मेरे बच्चे! पता नहीं उस खास वक़्त में मैं होऊंगा या नहीं, मगर मेरा आशीर्वाद और प्यार सदा तुम्हारे पास बना रहेगा और यह तुम्हारे धैर्य की शक्ति के परीक्षण का समय भी होगा जो मैं इस वक़्त तुम्हारी शिक्षा के माध्यम से तुम्हें सिखा रहा हूँ...अभी ऐसे वक़्त में जब मेरे धैर्य परीक्षण की बारी चल रही है, हो सकता है कि, मैं तुम्हारी सारी ज़रूरतों को पूरा न कर सकूँ क्योंकि इस वक़्त मेरा सारा ध्यान परिवार का खर्च चलने में है, जिसमे सबसे ज्यादा ज़रूरी तुम्हारी पढाई की फीस है. शिक्षा जो तुम पा रहे हो, जो बाँटने पर भी ख़त्म नहीं होती. एक यही चीज़ ऐसी होगी जिसे तुम मरकर भी अपने साथ ले जा सकोगे. मेरे बेटे! मैं जानता हूँ कि, तुम्हें अभी ढेर सारी चीज़ों कि ज़रूरत है, मगर अफ़सोस कि, वर्तमान आमदनी में मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरी नहीं कर सकता. मगर मुझे ख़ुशी होगी कि तुम अपनी शिक्षा अच्छी तरह पूरी करो और बाद में जब कभी पिता बनो तो ऐसे बच्चे के पिता बनो जिसकी हर ख्वाहिश तुम पूरी कर सको.......आमीन! 

11 मई 2010

एक प्रेम कहानी


वैसे तो प्रेम कहानियां कई तरह की हैं जैसे- सुलक्षणा-अमर की, राधा- निशांत की, सोणी-भारद्वाज
की  आदि-आदि . क्या सुना नहीं! ताज़ुब्ब है!  छोडिये  जाने  दीजिये . आज मैं आपको एक ऐसी प्रेमकहानी सुनाऊंगा जिसे सुनकर आप गुनगुना उठेंगे अरे-अरे ! यूँ न मुहं बिचकाएं ये ऐसी-वैसी प्रेमकहानी नहीं है भई, कुछ खास है इसमें, कुछ बात है इसमें. अब आप कहेंगे कि भला ऐसा क्यों !, अरे भईया!  यदि राजश्री बैनर को पता चलेगी यह कहानी तो फिर इसी कहानी को आप १००-१०० रुपये खर्च करके देखेंगे और वाह!वाह! कहेंगे. 

.....तो बिना ढेंन-ढेंन किये लड़के का हुलिया आपके सामने प्रस्तुत है, कद लम्बाई से थोडा छोटा , चेहरा सुन्दर से थोडा कम, चेहरे पे चश्मा, रंग गोरापन का आभास देता. कुल मिलाकर एक ही लड़का ! 
    लड़का बहुत दिनों से अपने अमर प्रेम की खोज में लगा था. पढने में तो बिलकुल ही ठीक था. मैट्रिक घींच-घांचकर सेकंड डिविजन से पास कर ली थी, अब अपने अ.प्रे. की खोज में अध्यनरत था. जैसा की आपने ठीक अनुमान लगाया, उसके घर के सामने नहीं ! बगलवाले घर में एक लड़की का आगमन हुआ. पान खाइएगा ? नहीं, जरा हमको खा लेने दीजिये . तो लड़काss अपने लड़कपन की पूरी जवानी पे था. उसके दोस्त उसकी भाग्यता(?) पर जल-जल कर रोज उसके घर आते, और आहें भरते की काश! उनका घर भी उसी मोहल्ले में होता. तो ज़नाब बात उन दिनों की है जब आसमान पर कमीनेपन के बादल नहीं मंडराते थे, लोग सच्चे और मकान कच्चे हुआ करते थे. लड़के का एक सच्चा दोस्त भी था, सारे दोस्तों के होने के बावजूद.
हें! हें! हें ! क्या कहूँ ज़नाबे-हाजरीन ! अब अपनी तारीफ खुद ही करते अच्छा नहीं लगता मगर फिर भी बताये देता हूँ , उस लड़के का सच्चा दोस्त मै ही हूँ . आगे की डासटान! क्ष्मा कड़ेंगे डरा ठूक लेने दें...हाँ! अब ठीक है . तो मै कहाँ था? हाँ! याद आया  दास्ताने मोहब्बत का चश्मदीद आपके सामने पेश करता है



जनवरी का महिना:
लड़की अपने बरामदे में सिलाई मशीन पर झुकी हुई थी  और कुछ खटर-पटर करती सिलाई जैसा ही कार्य कर रही थी. लड़का अपने हाते में अपने सच्चे दोस्त के साथ खड़ा नयन सुख का मज़ा लूट रहा था.जबकि लड़की उसके चलायमान शरीर  के इशारों से वाकिफ थी.  स.दो. ने लड़के के कान में कुछ फुसफुसाया, लड़का डरकर नहीं-२ कहने लगा, स.दो. ने आँखे तरेर के कहा- तो साले! मै ही..तब जाकर लड़के को ताव आया, जैसा की उस उम्र में आता ही है (देरसबेर), लड़का अपने घर के अन्दर गया, अपनी काँपी का एक पन्ना फाड़ा और उसपे अंग्रेजी के हर्फों में शाश्वत वाक्य लिखा- I LOVE YOU !,और लड़की से बोला- ज़रा छत पर आएँगी क्या ? क्या काम है? लड़की ने पूछा, काम तो जरुरी है तभी तो आपको बुला रहा हूँ. लड़की छत पर आयी तब लड़के ने कहा-आपको एक चीज़ दिखानी है, दिखाइए! लड़की बोली, पता नहीं क्या हुआ एकदम से लड़के का कंठ सूख गया मुंह से आवाज़ निकलनी बंद हो गई, चुपचाप कागज़ का टुकड़ा आगे बढ़ा दिया, "आइये ज़नाब यहाँ इस पत्थर पर बैठ जाते हैं, तो कहिये कैसा लग रहा है , क्या? मज़ा नहीं आ रहा ? थ्रिल नहीं है ? अमाँ यार! अभी तो आपसे बहस की गुंजाइश बन पड़ी है, वो कैसेss? वो ऐसे कि, हम आज भी संस्कृति-२ को भज रहे हैं और लड़का है कि लड़की को (ध्यान दीजियेगा ज़नाब: लड़की को..)  वो भी अंग्रेजी में I LOVE YOU  कह रहा है वो भी उस सड़े-गले मोहल्ले में, तो आइये हम इस अंग्रेजी-दां प्रणय-निवेदन के खिलाफ एक मोर्चे का गठन करते हैं. "अरे यार ये कहाँ ले उड़े बात को? अरे भैया, बात को हम नहीं उड़ाते बात तो अपनेआप  उड़ जाती है, अब देखिये न ! लड़की ने कागज़ पर नज़र दौड़ाई और मुस्कुरा कर बोली-मुझे अंग्रेजी नहीं आती. लड़के को उसके अंग्रेजी न आने से ज्यादा ख़ुशी उसकी मुस्कराहट से हुई, उसने कहा आप एक मिनट रुकिए और वह दौड़ कर नीचे गया कांपते हाथो से उसने हिंदी में लिखा -मैं तुमसे प्यार करता हूँ ! (और जैसे ही लड़के ने इस संस्कृतिमय भाषा का उपयोग किया आकाश से फूल बरसने लगे और साधु!साधु! की आकाशवाणी होने लगी.) और दौड़कर वापस छत पर आया और लड़की को उसने कागज़ सौंपा. लड़की ने कागज़ पढ़ा और लेकर नीचे चली गई. "अब श्रीमंत एक चाय का दौर हो जाये, बोलते-बोलते थक गया हूँ .
      अच्छा साहबान ! चाय पीते-पीते हम एकाध जरुरी और गैरजरूरी बातों पर ध्यान दे सकते हैं, वो क्या ? ज़नाब देखा जाये तो यह 'प्रेम या प्यार' जो चीज़ है अच्छों -अच्छों का हाजमा बिगाड़ के रख देती है , वो कैसे ? "ज़नाब आपने कभी किसी से प्यार किया है "? नहीं तो.!...तब कैसे पता चलेगा !- एक कविता सुनाने की गुस्ताखी कर रहा हूँ
मेरा प्रेम नदी नहीं, सागर नहीं
दलदल है
पड़ना है यदि मेरे प्रेम में
तो घुसना पड़ेगा इसमें
और एक बार घुस के चाहोगे
निकलना तो और धंसते जाओगे
मेरे प्रेम के दलदल में..
                              " अमाँ क्या सुनाने लगे तुम भी यह अच्छी भली प्रेमकहानी सुनाते-सुनाते ? आगे क्या हुआ बताओ तो ! हाँ भैया सुनाता हूँ ! मगर एक बात बताओ  किसी दूसरे की प्रेमकहानी में किसी को क्या मज़ा आता होगा? "आता है न ! जैसे कहानी में मज़ा आता है, फिल्म में मज़ा आता है उसी तरह मुझे इसमें मज़ा आ रहा है." देखो बातों में वक़्त जाया न करो, आगे क्या हुआ बताओ ? तनिक ठहरो बाबू मोशाय! पहले यह गाना सुनो :
http://www.dishant.com/jukebox.php?songid=55947५५९४७ कैसा लगा ? हाँ ss ठीssक है , मगर तुम बीच में ब्रेक क्यों ले रहे हो?
           ज़नाब मुझे अपराधबोध हो रहा है!  क्यों ? दरअसल मैं प्रेमकहानी सुनाते-सुनाते यह भूल गया कि, यह प्रेमकहानी सिर्फ लड़के की ही नहीं बल्कि एक लड़की की भी तो है, अरे भई ! एक ही तो बात है,  नहीं ss  एक ही बात नहीं है बाबू मोशाय!.. भला आप क्या जाने एक लड़की के मन की व्यथा ! अच्छा आप ही बताएं, आपने कितनी लड़कियों की प्रेम-गाथा सुनी है ? ज़नाब लड़कियों का प्रेम कुचल दिया जाता है हमारे ही द्वारा ! कितने ही सुन्दर चेहरे तेजाब से बर्बाद हो जाते हैं हम पुरुषों का प्रेम नहीं स्वीकारने के चलते, न जाने कितने ही जतन से किसी लड़की के मन में प्यार का अंकुर फूटता है, बड़े ही अरमानों से लड़की उस प्रेम के अंकुर को अपने मन में सींचती रहती है, और जब वक़्त आता है फूल खिलने का तो तरह-तरह की सामाजिक बाधाएं....(शेष अगली पोस्ट में )










6 मई 2010

गुडिया की शादी

गुडिया मेरी छोटी बहन है , जिसकी शादी के लिए मैं कई साल से परेशान था. १२ दिस. २००९ को उसकी शादी आमोद से हुई. मेरे सारे रिश्तेदार और दोस्त (जिनका मै शुक्रिया अदा करूँगा तो वे बुरा मान जायेंगे ) इस शादी में शरीक हुए और वर-वधु को अपने आशीर्वादों एवं स्नेहाशिषों से नवाज़ा. मेरा घर एक ऐसी गली में है जहाँ कार नहीं जा सकती. इस वजह से हमलोगों ने जैन धरमशाला बुक कर रखी थी. शादी के एक दिन पहले हमसभी वहां पहुँच गए. ११ तारीख को हल्दी की रस्म थी. हमारे यहाँ हल्दी के दिन विशेष प्रकार का भोजन बनता है जिसे कच्ची कहा जाता है. भोजन में भात, दाल, कढ़ी-बरी, फुलौरा, पापड़, दनौरी-चनौरी, बैगन-साग की सब्जी एवं एक अन्य तरह की सब्जी बनाई गयी थी. हल्दी का खाना रात १० बजे तक सभी ने खा लिया. मुझे नींद नहीं आ रही थी, फिर भी सोते-सोते रात के दो बज ही गए. अगले दिन शादी की तैयारी की गहमागहमी में कौन आया और कौन नहीं आया इसका मुझे पता भी न चला. कुछ विशेष कारणों से मैं रोया भी पर आत्मविश्वास भी जागृत हुआ. बारात तो नियत समय पर जनवासा में आ गई थी पर द्वार लगने में बहुत देर हो गई. मै बारात के जनवासा आने से लेकर दरवाजे लगने तक साथ ही था. लगभग सभी मेहमानों ने खाना खा लिया था जो बचे हुए थे उन्होंने बारातियों के साथ ही खाना खाया. रात कैसे बीत गयी, शादी हो भी गई पर मुझे थकान महसूस नहीं हो रही थी. गुडिया को विदा करते वक्त मन भर तो आया मगर जाहिर नहीं किया. अब ईश्वर से यही प्रार्थना है की वो जहाँ रहे सुख-शान्ति और आमोद-प्रमोद के साथ अपना जीवन बिताये. 

मेरे बाबा

मेरे दादाजी,  जिन्हें मैं बाबा कहा करता था ; का मेरी जिंदगी में बड़ा ही अहम् स्थान रहा है. यदि उनका सानिद्ध्य मुझे नहीं मिला होता तो न जाने मैं कैसा होता. मेरे बाबा आरा के जैन स्कूल में शिक्षक थे. वो सन १९७१ में रिटायर हो गए थे. स्कूल के कड़े शिक्षकों में उनका नाम लिया जाता था.  मेरे होश में घर में उन्ही का साम्राज्य था और उनपर मेरी दादी का या मेरा. मेरे बाबा पुराने ज़माने के शिक्षक थे और विद्यार्थियो को पीटकर सिखाने में विश्वास रखते थे . एकबार उन्होंने लोटा-लोटाकर मुझे पीटा, "मारते जाते और कहते - "सब लईका साल में दू इंच बढेलेसन  आ ई एक इंच घटते जाता." दादी ने आ के मुझे बचाया. दादी मुझे ऐसे ही  वक्त में अच्छी लगती थी, बाकि मैं सारे वक्त बाबा के साये में ही रहता था. बाबा से जो कह दो तुरंत पूरा हो जाता. घर से बाहर ज्यादा नहीं रहने देते थे मुझे जबकि मै इसी ताक में रहता था कि कब बाहर जाकर खेलने जाऊं. शाम को ठीक ५ बजे दुनिया के किसी कोने में मै रहूँ , बाबा के पुकारने कि आवाज मेरे कानो में पड़ ही जाती थी. बाबा ने मुझे बाहर ना जाने देने के लिए एक खास तरीका अपनाया, उन्होंने कहानियों की किताबें लानी शुरू कर दीं. धीरे-धीरे मेरा मन उनमे रमता गया. फिर स्कूल में दूसरे बच्चों को कॉमिक्स पढते देख शौक और भी चर्राने लगा. राजेंद्र नगर, जहाँ हमलोग रहते थे,  ऊपर बड़े पापा जासूसी उपन्यास आदि पढ़ते थे, एक बार उनकी जो आदत लगी आज तक नहीं छूटी, हाँ चूजी जरुर हो गया हूँ . बाबा ने हिंद पाकेट बुक्स की "घरेलु लाईब्रेरी" का सदस्य बना दिया, उसवक्त मैं छठी कक्षा का छात्र था. कर्नल रंजीत, वेदप्रकाश काम्बोज, ओमप्रकाश शर्मा, गुलशन नंदा, रानू, इब्ने सफी, चंदर उसवक्त काफी प्रिय थे मगर इनके साथ अमृतलाल नागर, मिथिलेश्वर, रामकुमार भ्रमर, प्रेमचंद, फणीश्वर नाथ रेणु आदि ने मेरा दिमाग इस कदर घुमाया की मै आठवीं कक्षा में दो बार फेल हो गया. बाबा ने कैसे कैसे यत्न करके मुझे मैट्रिक पास कराया. बाबा १९८८ में काफी अशक्त हो गए थे. मुझे याद है कि १७ अक्तूबर को वो अंनत की यात्रा पर चले गए. मुझे बाबा की मार याद है, अपने बेटे को कभी अपनी की गई बदमाशी दोहराते देखता हूँ तो बरबस मन डबडबा जाता है. काश कि बाबा होते तो मेरे बेटे को देख कितना खुश होते. आज अगर अपने मन की बातों को लिखने में सक्षम हूँ तो सिर्फ बाबा कि वजह से. 

             मुझे याद है कि मैं जब कक्षा पांचवी "नवीन" में पढता था तब मेरे बाबा ने मुझे हिंद पॉकेट बुक्स की घरेलू लाईब्रेरी का सदस्य बनवाया और वी.वी.पी. से मेरे लिए किताबें मंगवाने लगे. उस वक्त ना तो टी.वी. था ना ही इंटरनेट.
मुझे किताबों का ऐसा चस्का लगा कि, आठवीं कक्षा पासमार्क नहीं आने से मुझे दो बार फेल कर दिया गया. मैंने निराश होकर सुरेंद्र मोहन पाठक, वेद प्रकाश (कॉम्बोज और शर्मा) कर्नल रंजीत, चंदर, जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा और यशपाल, मिथिलेश्वर, अज्ञेय, नरेंद्र कोहली, रामकुमार भ्रमर, नागार्जुन आदि को चिठ्ठियां लिखीं ताकि वो लोग मुझे अपने पास बुलाकर मुझसे उपन्यास लिखवा सकें. उन चिठ्ठियों का जबाब न आना था, न आया..
        खैर, बाबा क्रोधित न हुए बल्कि आगे पढने का उचित प्रबंध कराया. उसी पढने के दौर में एक लत लग गयी कि मैं खाना खाते वक्त कोई ना कोई किताब पढता था इस तरह खाना खाने पर ध्यान कम पढने पर ज्यादा होता था, बाबा को छोड़ सब मुझे डांटते थे. एक दिन खाने के वक्त कोई भी किताब नहीं मिली तो मैंने पूजाघर से "रामचरितमानस" ही उठा लिया और खाने के साथ लंकाकाण्ड पढने लगा...थोड़ी देर बाद ऐसा लगा मेरे सर पर आसमान टूट पड़ा.हो.!!! मेरी आंखो के सामने अंधेरा छा गया..! चश्मा दूर छिटक गया..! खाने की थाली झनझनाकर दूर चली गयी..! मारे डर के और सहम कर मिचमिचाती आंखो से लेटे-२ ही गरदन उठा कर देखा तो बाबा पीछे खड़े थे..मारे गुस्से के उनके पूरा बदन कांप रहा था, नथुने क्रोध से फूल-पिचक रहे थे..! जैसे ही मेरी नजरें उनकी नजरों से मिली..फिर से मेरी आंखो के सामने जैसे बिजली कौंध गई.!!..गाल पर पड़े तमाचे ने मेरी कानों में सीटियां बजा दीं..मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था..बेवकूफ!..सूअर..!..कुत्ते..!..गदहे..! जैसे असम्मानीय शब्द जो मैंने पहले कभी नहीं सुने थे..उनसे मेरी नवाज़िश की जा रही थी..झोंटे से पकड़ के बाबा ने मुझे उठाया और वैसे ही कमरे के बाहर लाए...तबतक दादी, अम्मा, बड़का पापा मेरे व बाबा के नजदीक आ गए थे, दादी ने मुझे जबरन बाबा की हद से छुड़ाया और बाबा पर बरस पड़ीं..बाबा ने जब बताया कि मैं खाते हुए रामायण पढ रहा था तो एकबारगी सबका नजरिया सहानुभूति से गुस्से में बदल गया...पर कुछ ही पल में दादी बाबा पर ही उबल पड़ी और उनकी दी हुई छूट को ही दोषी करार देने लगी..बाबा बकते-झकते बाहर वाले कमरे में चले गये..मैं अम्मा और दादी के स्नेहपूर्ण रवैये से कुछ-कुछ भयरहित होने लगा..
..बहरहाल उस घटना के घटित होने के बाद मेरी आदत तो नहीं छूटी वरन कम जरूर हुई और उसवक्त एक चौकन्नापन मुझपर हावी हो गया. खाते समय लंकाकाण्ड पढते मुझे मजा आ रहा था तो रामचरितमानस एक हफ्ते में खत्म कर डाली..

उपसंहार: परसों पापा की तबियत खराब में जब मैं उन्हे रामचरितमानस सुना रहा रहा था तब उन्होंने मना कर दिया कि अच्छा नहीं लग रहा..तो अचानक प्लेटो के 'मेनो' की याद आयी जिसमें इस प्रश्न से शुरूआत होती है कि, सुकरात, "क्या तुम बता सकते हो कि क्या धर्म सिखाया जाता है?"..सुकरात कहते हैं कि धर्म का सिर्फ अनुस्मरण किया जाता है.." फिर मैंने मोबाईल पर हेमंत कुमार व मुकेश के गीत लगा दिया तो पापा आंख बंद कर धीरे-२ नींद की आगोश में जाने लगे...कभी फुर्सत हो तो सुनें..मन्ना डे..को....
https://youtu.be/pQpNVvqpQq0


3 मई 2010

पिछले रविवार को "हाउसफुल" देखने गया था. पिक्चर देखने के लिए बेटे से पूछा तो उसने मुहँ बिचका दिया. फिल्म की कहानी ऐसी है कि, एक अभागा मगर सच्चा इन्सान है अक्षय कुमार जो न चाहते हुए भी ढेर सारी मुसीबतों में घिर जाता है. इस तथाकथित हास्य फिल्म में एक ऐसा जीवंत हास्य दृश्य आता है जब फिल्म में सारे कलाकार हँसते हैं और दर्शक दृश्य को
समझने में चुपचाप  बैठे रहते हैं मैंने उसी वक्त पैसे कि परवाह न करते हुए हाल से बाहर आने में ही अपनी भलाई समझी. बाहर
बड़ी भीड़ थी पुलिस वाले भीड़ को सँभालने में लगे थे. ये सारे लोग वो थे जो इस तनाव भरी जिंदगी में थोडा मनोरंजन खोजने
सपनीली दुनिया में जाने कि ख्वाहिश रखते थे उन्हें क्या पता कि २५ रुपये में मनोरंजन अब महंगा हो गया है.









मन में काफी दिनों से विचार उत्पन्न हो रहा था कि, चिट्ठा -भाषा के बारे में कुछ लिखूं मेरी समझ से भाषा वही है जो दूसरों कि समझ में आये कि वो जो दिमाग के ऊपर से निकल जाये मेरे कहने का मतलब
इस उदाहरण से स्पष्ट हो जायेगा जैसे आमतौर पे किसी से समय पूछा जाता है तो मुख से निकलता है- "क्या टाइम हो रहा है" ? यहाँ तो पूछने वाले को परेशानी है बतानेवाले को, तो मेरी समझ में भाषा में रवानगी का होना सबसे अहम् है मै रोज़ ढेर सारे ब्लॉग पढता हूँ और यही महसूस करता हूँ कि ब्लॉग का विषय अच्छा है मगर भाषा में रवानगी (Flow) नहीं होती दूसरा विचार थोडा अलग हट कर है , मेरे द्वारा अपलोड किये गए पृष्ठ को पढ़कर  आपलोगों को लगेगा कि, किसी को प्रमोट कर रहा हूँ मगर यहाँ दूसरे के बहाने अपनी बात को सक्षम रूप से रखने कि चेष्टा है आशा है टिप्पणिया भेजेंगे .