क्या कहूँ ? क्या ना कहूँ ! ब्लॉग का नाम ही अजीब है भानुमती का कुनबा, पिटारा तो सुना था मगर कुनबा !?
एक लाइन याद आ रही है - लोग आते गए कारवां बनता गया तो मेरे दिमाग में पिटारे ने कुनबे की जगह ले ली ।
भले ही आप विश्वास करे या न करे, इस ब्लॉग का पंजीकरण किये एक साल हो गया मगर पहली पोस्ट आज लिख रहा हूँ। मगर किसके लिए लिखना ? अपने लिए ? स्वान्तः सुखाय, नहीं ? हा! हा! हा!
30 अप्रैल 2010
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