मेरे दादाजी, जिन्हें मैं बाबा कहा करता था ; का मेरी जिंदगी में बड़ा ही अहम् स्थान रहा है. यदि उनका सानिद्ध्य मुझे नहीं मिला होता तो न जाने मैं कैसा होता. मेरे बाबा आरा के जैन स्कूल में शिक्षक थे. वो सन १९७१ में रिटायर हो गए थे. स्कूल के कड़े शिक्षकों में उनका नाम लिया जाता था. मेरे होश में घर में उन्ही का साम्राज्य था और उनपर मेरी दादी का या मेरा. मेरे बाबा पुराने ज़माने के शिक्षक थे और विद्यार्थियो को पीटकर सिखाने में विश्वास रखते थे . एकबार उन्होंने लोटा-लोटाकर मुझे पीटा, "मारते जाते और कहते - "सब लईका साल में दू इंच बढेलेसन आ ई एक इंच घटते जाता." दादी ने आ के मुझे बचाया. दादी मुझे ऐसे ही वक्त में अच्छी लगती थी, बाकि मैं सारे वक्त बाबा के साये में ही रहता था. बाबा से जो कह दो तुरंत पूरा हो जाता. घर से बाहर ज्यादा नहीं रहने देते थे मुझे जबकि मै इसी ताक में रहता था कि कब बाहर जाकर खेलने जाऊं. शाम को ठीक ५ बजे दुनिया के किसी कोने में मै रहूँ , बाबा के पुकारने कि आवाज मेरे कानो में पड़ ही जाती थी. बाबा ने मुझे बाहर ना जाने देने के लिए एक खास तरीका अपनाया, उन्होंने कहानियों की किताबें लानी शुरू कर दीं. धीरे-धीरे मेरा मन उनमे रमता गया. फिर स्कूल में दूसरे बच्चों को कॉमिक्स पढते देख शौक और भी चर्राने लगा. राजेंद्र नगर, जहाँ हमलोग रहते थे, ऊपर बड़े पापा जासूसी उपन्यास आदि पढ़ते थे, एक बार उनकी जो आदत लगी आज तक नहीं छूटी, हाँ चूजी जरुर हो गया हूँ . बाबा ने हिंद पाकेट बुक्स की "घरेलु लाईब्रेरी" का सदस्य बना दिया, उसवक्त मैं छठी कक्षा का छात्र था. कर्नल रंजीत, वेदप्रकाश काम्बोज, ओमप्रकाश शर्मा, गुलशन नंदा, रानू, इब्ने सफी, चंदर उसवक्त काफी प्रिय थे मगर इनके साथ अमृतलाल नागर, मिथिलेश्वर, रामकुमार भ्रमर, प्रेमचंद, फणीश्वर नाथ रेणु आदि ने मेरा दिमाग इस कदर घुमाया की मै आठवीं कक्षा में दो बार फेल हो गया. बाबा ने कैसे कैसे यत्न करके मुझे मैट्रिक पास कराया. बाबा १९८८ में काफी अशक्त हो गए थे. मुझे याद है कि १७ अक्तूबर को वो अंनत की यात्रा पर चले गए. मुझे बाबा की मार याद है, अपने बेटे को कभी अपनी की गई बदमाशी दोहराते देखता हूँ तो बरबस मन डबडबा जाता है. काश कि बाबा होते तो मेरे बेटे को देख कितना खुश होते. आज अगर अपने मन की बातों को लिखने में सक्षम हूँ तो सिर्फ बाबा कि वजह से.
मुझे याद है कि मैं जब कक्षा पांचवी "नवीन" में पढता था तब मेरे बाबा ने मुझे हिंद पॉकेट बुक्स की घरेलू लाईब्रेरी का सदस्य बनवाया और वी.वी.पी. से मेरे लिए किताबें मंगवाने लगे. उस वक्त ना तो टी.वी. था ना ही इंटरनेट.
मुझे किताबों का ऐसा चस्का लगा कि, आठवीं कक्षा पासमार्क नहीं आने से मुझे दो बार फेल कर दिया गया. मैंने निराश होकर सुरेंद्र मोहन पाठक, वेद प्रकाश (कॉम्बोज और शर्मा) कर्नल रंजीत, चंदर, जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा और यशपाल, मिथिलेश्वर, अज्ञेय, नरेंद्र कोहली, रामकुमार भ्रमर, नागार्जुन आदि को चिठ्ठियां लिखीं ताकि वो लोग मुझे अपने पास बुलाकर मुझसे उपन्यास लिखवा सकें. उन चिठ्ठियों का जबाब न आना था, न आया..
खैर, बाबा क्रोधित न हुए बल्कि आगे पढने का उचित प्रबंध कराया. उसी पढने के दौर में एक लत लग गयी कि मैं खाना खाते वक्त कोई ना कोई किताब पढता था इस तरह खाना खाने पर ध्यान कम पढने पर ज्यादा होता था, बाबा को छोड़ सब मुझे डांटते थे. एक दिन खाने के वक्त कोई भी किताब नहीं मिली तो मैंने पूजाघर से "रामचरितमानस" ही उठा लिया और खाने के साथ लंकाकाण्ड पढने लगा...थोड़ी देर बाद ऐसा लगा मेरे सर पर आसमान टूट पड़ा.हो.!!! मेरी आंखो के सामने अंधेरा छा गया..! चश्मा दूर छिटक गया..! खाने की थाली झनझनाकर दूर चली गयी..! मारे डर के और सहम कर मिचमिचाती आंखो से लेटे-२ ही गरदन उठा कर देखा तो बाबा पीछे खड़े थे..मारे गुस्से के उनके पूरा बदन कांप रहा था, नथुने क्रोध से फूल-पिचक रहे थे..! जैसे ही मेरी नजरें उनकी नजरों से मिली..फिर से मेरी आंखो के सामने जैसे बिजली कौंध गई.!!..गाल पर पड़े तमाचे ने मेरी कानों में सीटियां बजा दीं..मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था..बेवकूफ!..सूअर..!..कुत्ते..!..गदहे..! जैसे असम्मानीय शब्द जो मैंने पहले कभी नहीं सुने थे..उनसे मेरी नवाज़िश की जा रही थी..झोंटे से पकड़ के बाबा ने मुझे उठाया और वैसे ही कमरे के बाहर लाए...तबतक दादी, अम्मा, बड़का पापा मेरे व बाबा के नजदीक आ गए थे, दादी ने मुझे जबरन बाबा की हद से छुड़ाया और बाबा पर बरस पड़ीं..बाबा ने जब बताया कि मैं खाते हुए रामायण पढ रहा था तो एकबारगी सबका नजरिया सहानुभूति से गुस्से में बदल गया...पर कुछ ही पल में दादी बाबा पर ही उबल पड़ी और उनकी दी हुई छूट को ही दोषी करार देने लगी..बाबा बकते-झकते बाहर वाले कमरे में चले गये..मैं अम्मा और दादी के स्नेहपूर्ण रवैये से कुछ-कुछ भयरहित होने लगा..
..बहरहाल उस घटना के घटित होने के बाद मेरी आदत तो नहीं छूटी वरन कम जरूर हुई और उसवक्त एक चौकन्नापन मुझपर हावी हो गया. खाते समय लंकाकाण्ड पढते मुझे मजा आ रहा था तो रामचरितमानस एक हफ्ते में खत्म कर डाली..
उपसंहार: परसों पापा की तबियत खराब में जब मैं उन्हे रामचरितमानस सुना रहा रहा था तब उन्होंने मना कर दिया कि अच्छा नहीं लग रहा..तो अचानक प्लेटो के 'मेनो' की याद आयी जिसमें इस प्रश्न से शुरूआत होती है कि, सुकरात, "क्या तुम बता सकते हो कि क्या धर्म सिखाया जाता है?"..सुकरात कहते हैं कि धर्म का सिर्फ अनुस्मरण किया जाता है.." फिर मैंने मोबाईल पर हेमंत कुमार व मुकेश के गीत लगा दिया तो पापा आंख बंद कर धीरे-२ नींद की आगोश में जाने लगे...कभी फुर्सत हो तो सुनें..मन्ना डे..को....
https://youtu.be/pQpNVvqpQq0
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