








मन में काफी दिनों से विचार उत्पन्न हो रहा था कि, चिट्ठा -भाषा के बारे में कुछ लिखूं । मेरी समझ से भाषा वही है जो दूसरों कि समझ में आये न कि वो जो दिमाग के ऊपर से निकल जाये । मेरे कहने का मतलब
इस उदाहरण से स्पष्ट हो जायेगा जैसे आमतौर पे किसी से समय पूछा जाता है तो मुख से निकलता है- "क्या टाइम हो रहा है" ? यहाँ न तो पूछने वाले को परेशानी है न बतानेवाले को, तो मेरी समझ में भाषा में रवानगी का होना सबसे अहम् है । मै रोज़ ढेर सारे ब्लॉग पढता हूँ और यही महसूस करता हूँ कि ब्लॉग का विषय अच्छा है मगर भाषा में रवानगी (Flow) नहीं होती । दूसरा विचार थोडा अलग हट कर है , मेरे द्वारा अपलोड किये गए पृष्ठ को पढ़कर आपलोगों को लगेगा कि, किसी को प्रमोट कर रहा हूँ मगर यहाँ दूसरे के बहाने अपनी बात को सक्षम रूप से रखने कि चेष्टा है। आशा है टिप्पणिया भेजेंगे .
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