गुडिया मेरी छोटी बहन है , जिसकी शादी के लिए मैं कई साल से परेशान था. १२ दिस. २००९ को उसकी शादी आमोद से हुई. मेरे सारे रिश्तेदार और दोस्त (जिनका मै शुक्रिया अदा करूँगा तो वे बुरा मान जायेंगे ) इस शादी में शरीक हुए और वर-वधु को अपने आशीर्वादों एवं स्नेहाशिषों से नवाज़ा. मेरा घर एक ऐसी गली में है जहाँ कार नहीं जा सकती. इस वजह से हमलोगों ने जैन धरमशाला बुक कर रखी थी. शादी के एक दिन पहले हमसभी वहां पहुँच गए. ११ तारीख को हल्दी की रस्म थी. हमारे यहाँ हल्दी के दिन विशेष प्रकार का भोजन बनता है जिसे कच्ची कहा जाता है. भोजन में भात, दाल, कढ़ी-बरी, फुलौरा, पापड़, दनौरी-चनौरी, बैगन-साग की सब्जी एवं एक अन्य तरह की सब्जी बनाई गयी थी. हल्दी का खाना रात १० बजे तक सभी ने खा लिया. मुझे नींद नहीं आ रही थी, फिर भी सोते-सोते रात के दो बज ही गए. अगले दिन शादी की तैयारी की गहमागहमी में कौन आया और कौन नहीं आया इसका मुझे पता भी न चला. कुछ विशेष कारणों से मैं रोया भी पर आत्मविश्वास भी जागृत हुआ. बारात तो नियत समय पर जनवासा में आ गई थी पर द्वार लगने में बहुत देर हो गई. मै बारात के जनवासा आने से लेकर दरवाजे लगने तक साथ ही था. लगभग सभी मेहमानों ने खाना खा लिया था जो बचे हुए थे उन्होंने बारातियों के साथ ही खाना खाया. रात कैसे बीत गयी, शादी हो भी गई पर मुझे थकान महसूस नहीं हो रही थी. गुडिया को विदा करते वक्त मन भर तो आया मगर जाहिर नहीं किया. अब ईश्वर से यही प्रार्थना है की वो जहाँ रहे सुख-शान्ति और आमोद-प्रमोद के साथ अपना जीवन बिताये.
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