पेशा : रिपोर्टर
आमदनी का दूसरा जरिया : किसी कंपनी का सामान लोगों को बेचना.
नाम : दूसरा दोस्त
पेशा : प्रिंटिंग प्रेस
आमदनी का दूसरा जरिया : किसी कंपनी का सामान लोगों को बेचना.
नाम : एक अजनबी, एक गृहणी, एक सफल व्यवसायी,
एक सरकारी कर्मचारी, एक विद्यार्थी ,
पेशा : अलग-अलग
एक सरकारी कर्मचारी, एक विद्यार्थी ,
पेशा : अलग-अलग
आमदनी का दूसरा जरिया: किसी कंपनी का सामान लोगों को बेचना.
ज़ाहिर है कि ऊपर लिखे सभी लोगों में सिर्फ एक समानता है कि वे ऐसी कम्पनी से जुड़े हुए हैं जिसका सामान बेचकर अपनी आमदनी में इजाफा करते हैं या फिर वर्तमान आमदनी इनके अनुकूल नहीं है. आमदनी के दूसरे ज़रिये को हेय दृष्टी से नहीं देखा जाना चाहिए मगर अपनेआप पर, अपने पेशे या अपने शौक को दरकिनार कर बाज़ार के हाथों कि कठपुतली बनते देख बुरा लगता है. बाज़ार की शक्ति असीम है, अभी कल ही उपरोक्त वर्णित दोस्त के बुलावे पर एक मीटिंग में गया था . काफी लोग थे वहां, मै भी पीछे जाकर खड़ा हो गया, एक लीडर इस घोर गर्मी में भी कोट-पैंट पहने जोर-जोर से (प्रभावशाली आवाज़ में) लोगों को करोडपति बनने के नुस्खे बता रहा था. कुछ लोगों को उसकी बातें समझ में नहीं आ रही थीं, कुछ लोग गर्मी से परेशान थे. कुछ लोग उसकी बातों को सुनकर उत्साहित ढंग से तालियाँ बजा रहे थे. लीडर बता रहा था कि, धन, समय, सुरक्षा को किस तरह से उसकी बताई कंपनी का सदस्य बनकर, काबू में किया जा सकता है. बन्दे ने एक चूहे-बिल्ली की कहानी सुनाई जिसमे चूहे और बिल्ली से पूछा गया कि भई क्या वजह है कि बिल्ली हमेशा पीछे रह जाती है चूहा बिल में चला ही जाता है? तो ज़वाब था "Y फैक्टर" के कारण जो कि सबमे अलग-अलग पाया जाता है, बिल्ली का "स्वादिष्ट मांस खाने का Y फैक्टर" कार्य करता है, ज़बकि चूहे का "अपना जीवन बचाने वाला Y फैक्टर". अब ज़रा गौर फरमाइए कि, क्या यहाँ बिल्ली का "स्वादिष्ट मांस खाने का Y फैक्टर" जायज़ है? यहाँ लीडर ने चालाकी से कहानी में फेरबदल करके तालियाँ पिटवाली. "Y फैक्टर" पश्चिमी देशों का दर्शन है जिसमे स्थिरता को खतरा माना जाता है और इसे दूर करने में "Y फैक्टर" का अहम् योगदान होता है. जबकि हमलोगों ने हाल-फ़िलहाल ही विकासशील देशों को छोड़कर पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी के दौर में उनकी अर्थ व्यवस्था को तितिर-बितिर होते देखा है. बहरहाल, बात हो रही थी "Y फैक्टर" की, पूरी दुनिया की आबादी को विभिन्न धार्मिक विश्वासों के आधार पर बांटा जा सकता है मगर आश्चर्यजनक बात यह है कि, हमारे मतभेदों के बावजूद हमारा एक ही लक्ष्य है-ख़ुशी प्राप्त करना जो हमें विभिन्न कार्यों और कारणों से प्राप्त होती है, इसे सरल गणितीय सूत्र में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-
मानव होने के नाते +"Y फैक्टर" = खुशियाँ यहाँ Y किसी व्यक्ति के जीवन में खुश हो लेने का प्रतिनिधित्व करता है. उपरोक्त समीकरण के अनुसार, "Y फैक्टर" केवल चर कारक है. क्योंकि हम सभी इंसान हैं, और सामान्य रूप में खुश होना चाहते हैं. मगर अफ़सोस कि ख़ुशी की यह परिभाषा जीवन के विभिन्न चरणों में एक जैसी नहीं रहती, इसके कारक ही बदल जाते हैं. अब जैसे बिल्ली का स्वादिष्ट मांस खाने का फैक्टर और चूहे का जीवन बचाने वाला फैक्टर मेरी समझ से एक ही है और वह है 'जीवन ' जिसके लिए हमसभी ,आपाधापी कर रहे हैं, सामान बेच रहे हैं, झूठ बोल रहे हैं. इस जीवन में किसी की ख्वाहिशें बिल्ली है तो किसी की ख्वाहिशें चूहा. ..और इस दौर में बाज़ार ही है जिसने इस चूहे-बिल्ली के खेल को शुरू किया है. एक कविता की बानगी लें :
आदमी आया
सपने आये
बाज़ार आया
सपने लाया
सपने आपस में झगडकर
लगे बिखरने,
बाज़ार के ३६ इंची टीवी वाले सपने के आगे
बच्चे की साइकल वाला सपना
हल्का पड़ने लगा,
बचाने के लिए अपने सपनों को
बाज़ार वाले सपने खरीदते-खरीदते आदमी
अपने सपनों को बेचने लगा
इस उम्मीद में कि,
बचे रहें सपने किसी न किसी की आँखों में
पर हत्तेरे की बाज़ार की!
आदमी की आँखों पर ही काबिज़ हो बैठा.
अब आदमी/दोस्त/रिश्तेदार हर दूसरे आदमी/दोस्त/रिश्तेदार का क्लाईंट
हो बैठा.
बाज़ार मस्त है, आदमी त्रस्त है !

1 टिप्पणी:
bahut achhe.......par baat jaha roti ki hi ho waha bazar ka sawal hi kaha paida hota hai
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